इज्ज़त सिर्फ उन लोगो की मत करो जो आपसे उमर में बड़े हो बल्कि इज्ज़त उन लोगो की करो जो सच में उसके लायक है फिर चाहे वो आपसे बड़े हो या छोटे
रविवार, 19 अप्रैल 2020
बुधवार, 15 अप्रैल 2020
सोमवार, 6 अप्रैल 2020
रविवार, 29 मार्च 2020
मुहर्रमुल हराम
मुहर्रमुल हराम इस्लामी साल का पहला महीना है ,
इस्लाम दुनिया का वाहिद मज़हब है जिसका इस्लामी साल मुहर्रमुल हराम में हज़रते फ़ारूके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु , हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और उनके रूफ़ाक़ा (साथियों) की बेमिसाल क़ुरबानी से शुरू हो कर हज़रते इस्माईल अलैहिस सलाम की ला ज़वाल क़ुरबानी पर इख़्तिताम पिज़ीर होता है।
इस्लाम दुनिया का वाहिद मज़हब है जिसका इस्लामी साल मुहर्रमुल हराम में हज़रते फ़ारूके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु , हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और उनके रूफ़ाक़ा (साथियों) की बेमिसाल क़ुरबानी से शुरू हो कर हज़रते इस्माईल अलैहिस सलाम की ला ज़वाल क़ुरबानी पर इख़्तिताम पिज़ीर होता है।
मगर कितने अफ़सोस की बात है कि मुहर्रमूल हराम शुरू होते ही ताज़िया दारों में एक ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है , दिलों में शादियाने बजने लगते हैं , माल जमा करने का सीज़न आजाता है .
फौरन पुराने ताज़िये अज़ सरे नौ बनने शुरू हो जाते हैं और जिन्हों ने अपने पुराने ताज़िये डिबो दिये होते हैं वोह दोबारा ताज़िया बनाने में मसरूफ़े अमल हो जाते हैं .
फौरन पुराने ताज़िये अज़ सरे नौ बनने शुरू हो जाते हैं और जिन्हों ने अपने पुराने ताज़िये डिबो दिये होते हैं वोह दोबारा ताज़िया बनाने में मसरूफ़े अमल हो जाते हैं .
स्टील , पीतल और चाँदी से तैयार करदह मस्नूई (बनावटी) हाथ , पाँव , आँखों और बाज़ुओं की तैयारी शुरू हो जाती है , उनका कारोबार उरूज पर पहुँच जाता है , हरे कपड़े और नीले पीले धागे फ़रोख़्त करने वालों की चाँदी हो जाती है .
बाज़ औरतें अपने बच्चों को शुहादाये करबला रिदवानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमाईन का फ़क़ीर बनाती हैं जो कि उन बच्चों को माँग कर खिलाती हैं ,
बाज़ बद नसीब सुन्नी हज़रात अपने घरों , दुकानों , सबीलों , मोटर कारों और मोटर साइकिलों में ज़ोर ज़ोर से मातम की कैसिटें बजाते हैं और काले कपड़े पहनकर फ़ख़र महसूस करते हैं .
बाज़ बद नसीब सुन्नी हज़रात अपने घरों , दुकानों , सबीलों , मोटर कारों और मोटर साइकिलों में ज़ोर ज़ोर से मातम की कैसिटें बजाते हैं और काले कपड़े पहनकर फ़ख़र महसूस करते हैं .
........ 9 मुहर्रमूल हराम का सूरज ग़ुरूब होते ही सड़कों और गली कूंचों में कैसा तूफ़ाने बद तमीज़ी मचाया जाता है ,
शहर के आवारा , बद तमीज़ और जाहिल नौजवान सरों पर हरी पट्टियाँ बांधे मंज़रे आम पर आ जाते हैं , ताज़िये निकाले जाते हैं और उसके साथ ज़ोर ज़ोर से ढोल पीटा जाता है , ताशे बजाए जाते हैं , कपड़े का दुर्रह बनाकर नौजवान एक दूसरे को पीटते हैं .
बे पर्दह ख़वातीन का हुजूम भी सड़कों पर निकल आता है , जिनके हाथ में बच्चे और नारियल होते हैं ,
वो बे पर्दह औरतें बड़े फ़ख़्र के साथ ताज़िये पर नारियल का चढ़ावा चढ़ाती हैं , मर्द हज़रात भी अपने बच्चों को साथ लाते हैं ताकि जाहिलों का तमाशा अपने छोटे बच्चों को दिखा कर उनका गुनाह भी अपने सर पे लें ,
नज़रो नियाज़ जैसी बा बरकत चीज़ को बे दर्दी से फेंका जाता है , रिज़्क़ की बे हुरमती होती है ,
बस यूँ समझो कि ताज़िये बनाकर इमामे हुसैन के नाम पर कमाई का धनदा खुल जाता है .
शहर के आवारा , बद तमीज़ और जाहिल नौजवान सरों पर हरी पट्टियाँ बांधे मंज़रे आम पर आ जाते हैं , ताज़िये निकाले जाते हैं और उसके साथ ज़ोर ज़ोर से ढोल पीटा जाता है , ताशे बजाए जाते हैं , कपड़े का दुर्रह बनाकर नौजवान एक दूसरे को पीटते हैं .
बे पर्दह ख़वातीन का हुजूम भी सड़कों पर निकल आता है , जिनके हाथ में बच्चे और नारियल होते हैं ,
वो बे पर्दह औरतें बड़े फ़ख़्र के साथ ताज़िये पर नारियल का चढ़ावा चढ़ाती हैं , मर्द हज़रात भी अपने बच्चों को साथ लाते हैं ताकि जाहिलों का तमाशा अपने छोटे बच्चों को दिखा कर उनका गुनाह भी अपने सर पे लें ,
नज़रो नियाज़ जैसी बा बरकत चीज़ को बे दर्दी से फेंका जाता है , रिज़्क़ की बे हुरमती होती है ,
बस यूँ समझो कि ताज़िये बनाकर इमामे हुसैन के नाम पर कमाई का धनदा खुल जाता है .
मैं ने इस चीज़ का बा क़ाएदा मुशाहिदा किया है कि लोगों ने ताज़िया दारी को कमाई का ज़रिया बनाया हुआ है , जितने साथी ताज़िया बनाने में शामिल होते हैं , ताज़िया दफन करने के बाद वो तमाम चढ़ावा अपने घर ले जाकर बा क़ाएदा आपस में तक़सीम करते हैं , और ताज़िये वाले अब तो बहुत चालाक हो गए हैं , सिर्फ ताज़िये की लकड़ियाँ और पत्तियाँ ही समंदर में डुबोते हैं .
ये भी इन लोगों की बे वक़ूफ़ी और अहमक़ाना तरीक़ा देखने के क़ाबिल है कि ये इतने बड़े अहमक़ हैं , इनका हाल ऐसा है कि जो ताज़िया 10 दिनों तक मुताबर्र्क था , जिन पर ख़ूब चढ़ावे चढ़ाये जा रहे थे , नारियल तोड़े जा रहे थे , ख़ूब मन्नतें मानी जारही थीं और अब बे चारे उसी ताज़िये को 10 मुहर्रमुल हराम की रात बे दर्दी से टुकड़े टुकड़े करके ढोल और ताशों की गूँज में समंदर में बहा दिया जाता है .
ये भी इन लोगों की बे वक़ूफ़ी और अहमक़ाना तरीक़ा देखने के क़ाबिल है कि ये इतने बड़े अहमक़ हैं , इनका हाल ऐसा है कि जो ताज़िया 10 दिनों तक मुताबर्र्क था , जिन पर ख़ूब चढ़ावे चढ़ाये जा रहे थे , नारियल तोड़े जा रहे थे , ख़ूब मन्नतें मानी जारही थीं और अब बे चारे उसी ताज़िये को 10 मुहर्रमुल हराम की रात बे दर्दी से टुकड़े टुकड़े करके ढोल और ताशों की गूँज में समंदर में बहा दिया जाता है .
ताज़िया दारों को इन मुक़द्दस दिनों में न इबादत की फिक्र होती है , न नमाज़ों की फिक्र होती है बल्कि और दूसरों की इबादतों में भी ख़लल डालते हैं , ये अपने फ़ासिद गुमान में समझते हैं कि हम नेकी का काम कर रहे हैं हालाँ कि उनके अफ़आल (काम) का इस्लाम से दूर दूर तक भी कोई तअल्लुक़ नहीं होता और न ही मसलके अहले सुन्नत (मसलके आला हज़रत) से इसका कोई तअल्लुक़ है .
आइये इन तमाम खुराफ़ातों के बारे में अपने इमाम आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत मुजद्दिदे दीनो मिल्लत मौलाना अहमद रज़ा खान साहिब किबला फ़ाज़िले बरेलवी अलैहिर रहमह की मशहूरे ज़माना तस्नीफ़ *फतावा रज़वीया से मदद लेते हुए इन ख़ुराफ़ातों की हक़ीक़त अवामे अहले सुन्नत के सामने वाज़िह करते हैं .
ताज़िये बनाना कैसा है .?
ताज़िये दारी के सिलसिले में यूँ सुना गया है कि सुल्तान तैमूर के दौरे हुकूमत में इसका आग़ाज़ हुआ , ताज़िया दारी बिदअत , हराम और नाजायज़ है ।
... (फतावा राज़वीया)
ताज़िये दारी के सिलसिले में यूँ सुना गया है कि सुल्तान तैमूर के दौरे हुकूमत में इसका आग़ाज़ हुआ , ताज़िया दारी बिदअत , हराम और नाजायज़ है ।
... (फतावा राज़वीया)
ताज़िये पर चढ़ावा चढ़ाना कैसा है ..?
ताज़िया बनाना (जो अवाम में राएज है) नाजाएज़ और बिदअत है , उसका बनाना गुनाह व मासियत और उसके ऊपर शीरीनी वग़ैरा (खाने पीने की चीजें , गुड़ और नारियल वग़ैरा) चढ़ाना महज़ जिहालत है और ताज़िये की ताज़ीम बिदअत , जिहालत और नाजाएज़ है .
*(अज़ : फतावा रज़विया , जिल्द 10 निस्फे आख़िर पेज 63)
ताज़िया बनाना (जो अवाम में राएज है) नाजाएज़ और बिदअत है , उसका बनाना गुनाह व मासियत और उसके ऊपर शीरीनी वग़ैरा (खाने पीने की चीजें , गुड़ और नारियल वग़ैरा) चढ़ाना महज़ जिहालत है और ताज़िये की ताज़ीम बिदअत , जिहालत और नाजाएज़ है .
*(अज़ : फतावा रज़विया , जिल्द 10 निस्फे आख़िर पेज 63)
ताज़िये का चढ़ावा खाना कैसा है ..?
....... ताज़िया का चढ़ावा नहीं खाना चाहिये ,
बाज़ लोग कहते हैं कि हम ताज़िये का चढ़ावा इस लिये नहीं खाते हैं कि वो ताज़िये का चढ़ा हुआ है बल्कि इस नियत से खाते हैं कि वो इमाम आली मक़ाम इमामे हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ है तो ये क़ौल भी ग़लत और बे हूदह है ,
क्यों कि ताज़िये पर चढ़ावा चढ़ाने से हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ नहीं होती .
....... ताज़िया का चढ़ावा नहीं खाना चाहिये ,
बाज़ लोग कहते हैं कि हम ताज़िये का चढ़ावा इस लिये नहीं खाते हैं कि वो ताज़िये का चढ़ा हुआ है बल्कि इस नियत से खाते हैं कि वो इमाम आली मक़ाम इमामे हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ है तो ये क़ौल भी ग़लत और बे हूदह है ,
क्यों कि ताज़िये पर चढ़ावा चढ़ाने से हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ नहीं होती .
ताज़िया दारी में तआवुन
...... ताज़िया दारी में किसी किस्म की कोई इमदाद और तआवुन जाएज़ नहीं (इमदाद करने वाला भी गुनहगार होगा) क्यों कि ये राफ़ज़ियों का तरीक़ा है , ताज़िये को जाएज़ समझकर बनाना ये फासिक़ों का तरीक़ा है .
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 471 , 472)
...... ताज़िया दारी में किसी किस्म की कोई इमदाद और तआवुन जाएज़ नहीं (इमदाद करने वाला भी गुनहगार होगा) क्यों कि ये राफ़ज़ियों का तरीक़ा है , ताज़िये को जाएज़ समझकर बनाना ये फासिक़ों का तरीक़ा है .
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 471 , 472)
मुहर्रमूल हराम में जाएज़ काम
..... मुहर्रमूल हराम के दस दिनों में बाज़ लोग पुराने कपड़े नहीं उतारते (साफ सुथरे कपङे नहीं पहनते) सिवाए इमाम हसन व हुसैन अलैहिमुर रिज़वान के किसी और की फ़ातिहा नहीं दिलाते , 10 मुहर्रमुल हराम को घर में झाड़ू नहीं देते और न ही दिन भर रोटी पकाते हैं और कहते हैं कि ताज़िये को दफन करने के बाद रोटी पकाई जाएगी , गोश्त वग़ैरा भी नहीं पकाते , ये तमाम बातें जिहालत पर मबनी हैं इस से मुसलमानों को बचना चाहिए .
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 536)
..... मुहर्रमूल हराम के दस दिनों में बाज़ लोग पुराने कपड़े नहीं उतारते (साफ सुथरे कपङे नहीं पहनते) सिवाए इमाम हसन व हुसैन अलैहिमुर रिज़वान के किसी और की फ़ातिहा नहीं दिलाते , 10 मुहर्रमुल हराम को घर में झाड़ू नहीं देते और न ही दिन भर रोटी पकाते हैं और कहते हैं कि ताज़िये को दफन करने के बाद रोटी पकाई जाएगी , गोश्त वग़ैरा भी नहीं पकाते , ये तमाम बातें जिहालत पर मबनी हैं इस से मुसलमानों को बचना चाहिए .
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 536)
मुहर्रमुल हराम में नाजाएज़ काम
....... ताज़िये बनाना , उस से मुरादें माँगना , अलम (झंडा) चढ़ाना , मेंहदी चढ़ाना ( जो मुहर्रमुल हराम की सात तारीख़ को हज़रते इमामे क़ासिम रदियल्लाहो तआला अन्हु की याद में मेंहदी लगाई और चढ़ाई जाती है) बच्चों को सब्ज़ कपड़े पहनाना और उनके गलों में डोरियाँ (बाज़ू पर डोरियाँ बाँधना) बाँध कर उनको इमामे हुसैन का फ़क़ीर बनाना (जो घर का खाना न खाए 10 दिन तक सिर्फ दूसरों से माँग कर फ़क़ीर की तरह खाये) 10 रोज़ तक सोगवार रहना (सोग इस्लाम में सिर्फ 3 दिन है जो वाकिआये कर्बला के बाद मुसलमानों ने मना लिया , अब कोई सोग नहीं ,
हाँ इमामे हुसैन की शहादत का ग़म वो एक अलग चीज़ है जो शरीअत के दायरे में रह कर दिल में रखा जा सकता है और कौनसा ऐसा मुसलमान होगा जो शहादते इमामे हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हु पर ग़मगीन न हो)
....... ताज़िये बनाना , उस से मुरादें माँगना , अलम (झंडा) चढ़ाना , मेंहदी चढ़ाना ( जो मुहर्रमुल हराम की सात तारीख़ को हज़रते इमामे क़ासिम रदियल्लाहो तआला अन्हु की याद में मेंहदी लगाई और चढ़ाई जाती है) बच्चों को सब्ज़ कपड़े पहनाना और उनके गलों में डोरियाँ (बाज़ू पर डोरियाँ बाँधना) बाँध कर उनको इमामे हुसैन का फ़क़ीर बनाना (जो घर का खाना न खाए 10 दिन तक सिर्फ दूसरों से माँग कर फ़क़ीर की तरह खाये) 10 रोज़ तक सोगवार रहना (सोग इस्लाम में सिर्फ 3 दिन है जो वाकिआये कर्बला के बाद मुसलमानों ने मना लिया , अब कोई सोग नहीं ,
हाँ इमामे हुसैन की शहादत का ग़म वो एक अलग चीज़ है जो शरीअत के दायरे में रह कर दिल में रखा जा सकता है और कौनसा ऐसा मुसलमान होगा जो शहादते इमामे हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हु पर ग़मगीन न हो)
शोहादाये कर्बला के सोयम और चेहल्लुम का इनिकाद करना (सोयम और चेहल्लुम विसाल के बाद सिर्फ एक ही मर्तबा होता है , अब सिर्फ यौमे शहादत मनाया जाता है और अवाम अक्सर ये कहते हैं कि आज इमामे हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हु का सोयम है फिर चेहल्लुम है , ऐसा कहना भी दुरुस्त नहीं) मातमी मरसियों का पढ़ना ये तमाम रस्में शरअन मना और नाजाएज़ हैं
इसी तरह यज़ीद की आड़ में हज़रत सैय्यदना कातिबे वही अमीर मुआविया रदियल्लाहो तआला अन्हु या किसी भी सहाबी ए रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहे वसल्लम को बुरा कहना शरअन मना और गुमराही है
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 537)
(अज़: फतावा रज़विया , जिल्द 10 , पेज 537)
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फ़ाज़िले बरेलवी अलैहिर रहमह अपनी मशहूर किताब अहकामे शरीअत में फरमाते हैं .
मुहर्रमुल हराम में (ख़ुसूसन मुहर्रम की 1 तारीख़ से 10 तारीख़ तक) तीन रंग के लिबास न पहनें जायें ,
1: हरा लिबास न पहना जाए कि ये ताज़िया दारों का तरीक़ा है ,
2: लाल रंग का लिबास न पहना जाए कि ये अहले बैत से अदावत रखने वालों का तरीक़ा है ,
3: काले रंग का लिबास न पहना जाए कि ये राफ़ज़ियों का तरीक़ा है , लिहाज़ा मुसलमानों को इस से बचना चाहिए ।
(अज़ किताब: अहकामे शरीअत)
1: हरा लिबास न पहना जाए कि ये ताज़िया दारों का तरीक़ा है ,
2: लाल रंग का लिबास न पहना जाए कि ये अहले बैत से अदावत रखने वालों का तरीक़ा है ,
3: काले रंग का लिबास न पहना जाए कि ये राफ़ज़ियों का तरीक़ा है , लिहाज़ा मुसलमानों को इस से बचना चाहिए ।
(अज़ किताब: अहकामे शरीअत)
ईसाले सवाब का अहसन तरीक़ा
......हज़रते इमामे हुसैन और शुहादाये कर्बला की याद में सबील क़ायम करके लोगों को पानी पिलाकर ईसाले सवाब किया जाए , लोगों को खाना खिलाया जाए , नज़रो नियाज़ का एहतिमाम किया जाए और यही बुज़ुरगाने दीन का भी तरीक़ा है ,
जैसा कि हज़रत शाह वलियुल्लाह मुहद्दिसे देहलवी अलैहिर्रहमा के साहबज़ादे हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे देहलवी अलैहिर्रहमा अपनी किताब *तोहफा इसना अशरिया* में फरमाते हैं (ये वो शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे देहलवी हैं कि जिनका नाम अगर किसी आलिमे दीन की सनद (सर्टिफिकिट) में न हो तो वो आलिमे दीन नहीं कहलाता) वो ये फरमाते हैं कि हज़रते अली रदियल्लाहो तआला अन्हु और औलादे अली में विलायत रूहानी तौर पर मौजूद है , इसी लिये मैं हर साल 10 मुहर्रम को हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हो की नियाज़ दिलाता हूँ और खड़े होकर उनपर सलाम भी पेश करता हूँ।
......हज़रते इमामे हुसैन और शुहादाये कर्बला की याद में सबील क़ायम करके लोगों को पानी पिलाकर ईसाले सवाब किया जाए , लोगों को खाना खिलाया जाए , नज़रो नियाज़ का एहतिमाम किया जाए और यही बुज़ुरगाने दीन का भी तरीक़ा है ,
जैसा कि हज़रत शाह वलियुल्लाह मुहद्दिसे देहलवी अलैहिर्रहमा के साहबज़ादे हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे देहलवी अलैहिर्रहमा अपनी किताब *तोहफा इसना अशरिया* में फरमाते हैं (ये वो शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिसे देहलवी हैं कि जिनका नाम अगर किसी आलिमे दीन की सनद (सर्टिफिकिट) में न हो तो वो आलिमे दीन नहीं कहलाता) वो ये फरमाते हैं कि हज़रते अली रदियल्लाहो तआला अन्हु और औलादे अली में विलायत रूहानी तौर पर मौजूद है , इसी लिये मैं हर साल 10 मुहर्रम को हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहो तआला अन्हो की नियाज़ दिलाता हूँ और खड़े होकर उनपर सलाम भी पेश करता हूँ।
आज उसका जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
एक ज़माना था जब हम उसकी ज़िन्दगी में उसकी जान हुआ करते थे
फिर एक वक्त आया ऐसा भी की हम कुछ ही दिनों में अंजान हुआ करते थे
वो अक्सर मुझसे ये कहा करती थी की तुम मुझे कभी धोखा नही देना
तब मैं भी उसको बोल देता था कि तुम मेरा भरोसा कभी मत खोने देना
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
उसके वो हमेशा साथ रहने के वादे मुझे याद हमेशा रहने वाले हैं
कभी जावेद ने उसके बेवफा नही कहा तो आज क्या कहने वाले है
मुझे याद है उसकी एक मुस्कान के लिये मैंने क्या क्या खोया था
मुझे याद हैं उसके लिए मैं सर्दी की लंबी रातों में भी खूब रोया था
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
तुम्हारे तमाम ज़ुल्म-मों सितम सहने पर भी मैं तुम्हें छोड़ने का फैसला आज तक नही ले पाया था
तो फिर बताओं मुझे सिर्फ मेरा चंद दिन नाराज़ रहने पर तुमने मुझे बेवफा कैसे मान लिया था
और सुन लो हमे तुम्हारे जिस्म की ज़रूरत ना कल थी ना आज हैं और ना ही कभी होगी
आज से ये बात ज़रूर याद रखना तुम्हारी ज़िन्दगी में अब हमारी कमी हर रोज़ होगी
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
एक ज़माना था जब हम उसकी ज़िन्दगी में उसकी जान हुआ करते थे
फिर एक वक्त आया ऐसा भी की हम कुछ ही दिनों में अंजान हुआ करते थे
वो अक्सर मुझसे ये कहा करती थी की तुम मुझे कभी धोखा नही देना
तब मैं भी उसको बोल देता था कि तुम मेरा भरोसा कभी मत खोने देना
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
उसके वो हमेशा साथ रहने के वादे मुझे याद हमेशा रहने वाले हैं
कभी जावेद ने उसके बेवफा नही कहा तो आज क्या कहने वाले है
मुझे याद है उसकी एक मुस्कान के लिये मैंने क्या क्या खोया था
मुझे याद हैं उसके लिए मैं सर्दी की लंबी रातों में भी खूब रोया था
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
तुम्हारे तमाम ज़ुल्म-मों सितम सहने पर भी मैं तुम्हें छोड़ने का फैसला आज तक नही ले पाया था
तो फिर बताओं मुझे सिर्फ मेरा चंद दिन नाराज़ रहने पर तुमने मुझे बेवफा कैसे मान लिया था
और सुन लो हमे तुम्हारे जिस्म की ज़रूरत ना कल थी ना आज हैं और ना ही कभी होगी
आज से ये बात ज़रूर याद रखना तुम्हारी ज़िन्दगी में अब हमारी कमी हर रोज़ होगी
जनाब आज उसके जन्मदिन का वो खूबसूरत दिन था
हम क्या करते जब उसका नम्बर पूरी रात ही बिजी था
गुरुवार, 15 अगस्त 2019
15 August Independence Day 2019
गुलशने हिन्द को शोलों से बचाना होगा
आतिशे बुग्ज़ ओ अदावत को बुझाना होगा
हकीकत में आज़ादी का जश्न मनाने के लिए, हर दिल मे प्यार का दीप जलाना होगा
दोहरा में आर हुकूमत के रव्वये में न हो
रंग और नस्ल के भेद मिटाना होगा
याद रखनी हैं शहीदाने वतन की सीरत
सरफरोशी का हुनर हमको दिखाना होगा
हमेशा मुल्क से हो मज़बूत हम सबका रिश्ता
तेरे मेरे की जसारत को मिटाना होगा
आओं हम सभी मिल के साथ चले
हम कदम हो के ख़ज़ाओ को मिटाना होगा
मुल्क ओ मिल्लत के लिए बेहतर हो जो रास्ता जावेद वही रास्ता हम सभी को अपनाना होगा
आतिशे बुग्ज़ ओ अदावत को बुझाना होगा
हकीकत में आज़ादी का जश्न मनाने के लिए, हर दिल मे प्यार का दीप जलाना होगा
दोहरा में आर हुकूमत के रव्वये में न हो
रंग और नस्ल के भेद मिटाना होगा
याद रखनी हैं शहीदाने वतन की सीरत
सरफरोशी का हुनर हमको दिखाना होगा
हमेशा मुल्क से हो मज़बूत हम सबका रिश्ता
तेरे मेरे की जसारत को मिटाना होगा
आओं हम सभी मिल के साथ चले
हम कदम हो के ख़ज़ाओ को मिटाना होगा
मुल्क ओ मिल्लत के लिए बेहतर हो जो रास्ता जावेद वही रास्ता हम सभी को अपनाना होगा
बुधवार, 14 अगस्त 2019
Mohd Javed Swimmer
रेडिसन द स्कूल में रविवार दिनांक 28/07/019 से 30/07/019 को नेशनल यूथ स्पोर्ट्स एंड फिटनेस फेडरेशन द्वारा 1वी उत्तर प्रदेश राज्य खेल प्रतियोगिता 2019 का आयोजन कराया गया। इस प्रतियोगिता में प्रदेश की 20 से अधिक टीमों ने भाग लिया।
इस तीन दिन की प्रतियोगिता में रविवार को 100 मीटर दौड़ में रेडिसन द स्कूल के छात्र दुष्यंत ने स्वर्ण पदक, यश ने रजत पदक और सौरव ने कांस्य पदक जीता।
वही कबडडी प्रतियोगिता में भी रेडिसन द स्कूल की स्कूल टीम के छात्र विराट, दुष्यन्त, अखिल, दीपांशु, निशांत, हर्ष, तेजप्रताप, आदित्य, अभय, शिवम, प्रांजल, निकुंज ने दूसरा स्थान प्राप्त करवा कर स्कूल का नाम रौशन किया
इस प्रतियोगिता को सफलतापूर्वक गौरांवित करने में रेडिसन द स्कूल के स्पोर्ट्स(कोच) मो० जावेद का कार्य सरहानीय रहा।
बुधवार, 13 मार्च 2019
घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005
गुरुवार, 7 मार्च 2019
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35-A क्या है???
याचिका में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत भारत में पहले से ही शामिल हो गया था। एनजीओ द्वारा दायर याचिका के अनुसार, डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह द्वारा "संदेह, भ्रम या अस्पष्टता को दूर करने" के लिए भारत संघ में प्रवेश के नए नियमों पर हस्ताक्षर किए गए थे (अक्टूबर 1947 में इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्ससेशन के जरिये)। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद द्वारा पारित आदेशों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए, याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रपति का यह आदेश राज्य के लिए कानून बनाने के लिए संसद की शक्तियों को सीमित करता है। याचिका में आगे यह भी कहा गया है कि अनुच्छेद 35-A "भारत की एकता की भावना" के खिलाफ है क्योंकि यह "भारतीय नागरिकों के वर्ग के भीतर एक वर्ग" बनाता है। अन्य राज्यों के नागरिकों को जम्मू-कश्मीर के भीतर रोजगार प्राप्त करने या संपत्ति खरीदने से प्रतिबंधित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। B - पश्चिम पाकिस्तान शरणार्थी एक्शन कमेटी सेल द्वारा दायर याचिका वर्ष 2015 में, पश्चिम पाकिस्तान शरणार्थी एक्शन कमेटी सेल ने एक रिट याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसमें विभाजन के बाद राज्य में बसने वाले शरणार्थियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात की गयी है। दरअसल पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों के पास राज्य में संपत्ति हासिल करने या वोट करने का अधिकार नहीं है और उन्हें स्थायी निवासियों के रूप में मान्यता भी प्राप्त नहीं है। उनका तर्क है कि उनका अधिकार उन लोगों की तरह होना चाहिए जो पश्चिम पाकिस्तान चले गए लेकिन अंततः वापस लौट आए। राज्य द्वारा पारित वर्ष 1982 के पुनर्वास अधिनियम का उल्लेख करते हुए, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इसने ऐसे व्यक्तियों और उनके बच्चों को स्थायी नागरिकता प्राप्त करने का अधिकार दिया (जो पश्चिम पाकिस्तान चले गए लेकिन अंततः वापस लौट आए)। C - याचिका चारू वली खन्ना द्वारा दाखिल याचिका दिल्ली स्थित कश्मीरी पंडित वकील चारु वली खन्ना की याचिका उनके निजी मसले से जुडी हुई है, पर यह भी अहम् सवाल उठाती है। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 35-A पुरुषों का पक्षधर है, चारू वली ने अदालत से कहा था, :जहाँ पुरुष बाहरी व्यक्ति (राज्य के बाहर) से शादी के बाद भी स्थायी नागरिकता का अधिकार नहीं खोते हैं, वहीँ अगर महिलाएं किसी बाहरी व्यक्ति से शादी करती हैं तो वह संपत्ति के ऊपर से अपना अधिकार खो देती हैं। उनका कहना है कि, राज्य के बाहर की एक महिला राज्य के पुरुष निवासी से शादी करने के कारण स्थायी निवासी बन जाती है, लेकिन राज्य के एक स्थायी नागरिक के रूप में जन्म लेने वाली महिला, बाहरी व्यक्ति से शादी करने के बाद अपना अधिकार खो देती है।
किन लोगों को निःशुल्क क़ानूनी सहायता नहीं दी जाएगी???
■निम्नलिखित मामलों में क़ानूनी सहायता नहीं मिलेगी;
●मानहानि, द्वेषपूर्ण अभियोजन, अदालत की अवमानना, झूठे साक्ष्य इत्यादि पर आधारित मामले।
●किसी भी चुनाव से सम्बंधित कोई कार्यवाही।
ऐसे मामले जहाँ पर दण्ड की आर्थिक राशि 50 /- रुपये से कम है।
●ऐसे अपराध के मामले जो कि आर्थिक और सामाजिक क़ानून के ख़िलाफ़ हैं। जैसे की ATM से पैसे चोरी करना, राज्य सम्पदा को नुकसान पहुँचना इत्यादि।
●आवेदक व्यक्ति मामले से सम्बंधित ही नहीं हैं।
■निम्नलिखित श्रेणी में आने वाले व्यक्ति को क़ानूनी सहायता नहीं दी जाएगी, और अगर दी जा रही है तो वापस ले ली जाएगी;
●ऐसा व्यक्ति जो कि खुद से सक्षम है और पात्रता मानक को पूरा नहीं करता।
●ऐसा व्यक्ति जिसके आवेदन पत्र में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे कि उसको सहायता दी जाये।
●ऐसा व्यक्ति जो कि गलत तरीके से जैसे दस्तावेज़ में धोखाधड़ी करके निःशुल्क सहायता प्राप्त करना चाहता हो।
●आवेदक द्वारा अधिवक्ता के साथ लापरवाही करना व ग़लत तरीके से पेश आना। आवेदक द्वारा दूसरे वक़ील से मदद लेना।
●आवेदक की मृत्यु हो जाना। लेकिन अगर मामला सिविल है तब उसके उत्तराधिकारी को क़ानूनी सहायता दी जाएगी।
●ऐसी कार्यवाही जो कि क़ानून व क़ानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल सिद्ध हो।
निःशुल्क क़ानूनी सहायता कैसे प्राप्त करें???
◆कोई भी व्यक्ति जो की उपरोक्त में से एक है निःशुक्ल क़ानूनी सहायता पाने के लिए अपने नजदीकी प्राधिकरण, समिति और विधिक सेवा केंद्र में लिखित प्रार्थना पत्र या फिर प्राधिकरण द्वारा जारी किये गए फॉर्म से आवेदन कर सकता है। अगर व्यक्ति लिखने में सक्षम नहीं है, तो वह मौख़िक माध्यम से अपना आवेदन कर सकता है, प्राधिकरण में मौज़ूद अधिकारी उस व्यक्ति की बातों को आवेदन पत्र में लिखेगा। शीला बारसे बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र में माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने कहा है की व्यक्ति की गिरफ़्तारी के तुरंत बाद पुलिस का यह अनिवार्य कर्त्तव्य है कि नजदीकी विधिक सहायता केंद्र में इसकी इत्तला की जाये जिससे की समय रहते अभियुक्त की क़ानूनी सहायता की जा सके।
◆इसके अलावा आप "राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण" जिसे हम NALSA भी बुलाते हैं की वेबसाइट पर जाके देश के किसी भी "विधिक सेवा संस्थान व प्राधिकरण" से क़ानूनी सहायता प्राप्त करने के लिए "ऑनलाइन एप्लीकेशन" फॉर्म ज़रूरी दस्तावेज़ों को अपलोड करके भर सकते हैं।
●क्या हैं ज़रूरी दस्तावेज़?
अगर हम जरुरी दस्तावेजों की बात करें तो मुख्य रूप से आपके पास एक एफिडेविट होना चाहिए जिसके साथ में आपका वार्षिक आय प्रमाण पत्र, पहचान पत्र हो। बाकी दस्तावेज़ आपके केस पर निर्भर करेंगे। ध्यान रहे यह कागज़ात विधिक सेवा केंद्र या प्राधिकरण में भी ले जाना और दिखाना ज़रूरी है।
●किस प्रकार की क़ानूनी सहायता दी जाएगी???
◆आपके लिए एक वक़ील नियुक्त किया जायेगा।
◆कोर्ट की कार्यवाही में जो भी ख़र्च होगा वह दिया जायेगा, जैसे की कोर्ट फीस आदि।
◆कोर्ट के आदेशों की प्रति एवं अन्य दस्तावेज जो भी न्यायालय की कार्यवाही से जुड़े होंगे आपको उपलब्ध कराये जायेंगे।
◆आपके मामले से सम्बन्धी कागजों को तैयार व प्रिंट कराया जायेगा।
◆आपके लिए आपकी भाषा में कोर्ट के आदेशों को अनुवादित भी किया जायेगा आदि।
कौन हैं निःशुल्क क़ानूनी सहायता प्राप्त करने के हक़दार???
मुफ्त क़ानूनी सहायता आपका अधिकार है
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Mohd javed writing
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